धार्मिक एवं सामाजिक जानकारी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार गुरु मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) भ्रमण करते हुए गोदावरी नदी के तट पर स्थित चंद्रगिरि पहुंचे। वहां सरस्वती नाम की एक निसहाय और निःसंतान स्त्री रहती थी। उसकी व्यथा जानकर, मत्स्येन्द्रनाथ ने उसे एक सिद्ध विभूति दी और कहा कि इसके सेवन से उसे तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी।
लेकिन, उस स्त्री ने लोक-लज्जा या समाज के डर से उस दिव्य भस्म (विभूति) को एक गोबर के गड्ढे में फेंक दिया। बारह वर्षों के बाद, जब गुरु मत्स्येन्द्रनाथ उसी स्थान से वापस गुजरे, तो उन्होंने उस स्त्री से उस बालक के बारे में पूछा। स्त्री ने पूरी सच्चाई बता दी।
इसके बाद गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने उस गोबर के ढेर से एक तेजस्वी और दिव्य बालक को बाहर निकाला। चूँकि उस बालक की उत्पत्ति 'गाय के गोबर' से हुई थी और स्वयं गो (गाय) माता ने उसकी रक्षा की थी, इसलिए गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने उसका नाम 'गोरक्ष' रखा। बाद में यही बालक गुरु गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ और उन्होंने ही नाथ योग परंपरा की स्थापना की।
नाथ संप्रदाय (नाथ जोगी या योगी समाज) की स्थापना आदि गुरु भगवान शिव (आदिनाथ) द्वारा मानी जाती है। इसके बाद गुरु मत्स्येन्द्रनाथ और उनके शिष्य महायोगी गुरु गोरखनाथ ने इस संप्रदाय का विस्तार और प्रचार-प्रसार किया। गुरु गोरखनाथ जी ने हठयोग की परंपरा की शुरुआत की और पूरे भारतवर्ष में नाथ योगियों के 12 पंथ (बारह पंथ) स्थापित किए।
नाथ योगी शिव के उपासक होते हैं और वे 'अलख निरंजन' का उद्घोष करते हैं। समाज में योग, त्याग और तपस्या के माध्यम से जन-कल्याण की भावना नाथ समाज का मूल उद्देश्य रहा है। आज भी नाथ जोगी समाज अपनी प्राचीन परंपराओं, सामाजिक सद्भाव और आध्यात्मिक चेतना के लिए जाना जाता है।
हिंगलाज माता का मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हिंगोल नदी के तट पर एक प्राचीन गुफा में स्थित है। यह ५१ शक्तिपीठों में से एक है।
यह ५१ शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ देवी सती का सिर (ब्रह्मरंध्र) गिरा था। इन्हें 'नानी' भी कहा जाता है और स्थानीय मुस्लिम समुदाय भी इनकी बहुत मान्यता करता है।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती ने अपने पिता राजा दक्ष द्वारा किए गए अपमान के कारण यज्ञ कुंड में अपने प्राण त्याग दिए थे। उनके वियोग में भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर तांडव करने लगे। संपूर्ण सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को ५१ भागों में विभाजित कर दिया।
जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। इसी घटना में उनका मस्तिष्क इस स्थान पर गिरा था।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान परशुराम ने पृथ्वी से २१ बार क्षत्रियों का नाश करने का संकल्प लिया था, तब अपनी जान बचाने के लिए बचे हुए क्षत्रिय माता हिंगलाज की शरण में आए। माता ने उन क्षत्रियों को अभयदान दिया और उन्हें 'ब्रह्म क्षत्रिय' बना दिया, जिससे वे परशुराम के क्रोध से सुरक्षित हो गए।
एक अन्य कथा के अनुसार, रावण वध के पश्चात ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्रीराम भी माता हिंगलाज के दरबार में आए थे और उन्होंने यहाँ यज्ञ किया था।
भारत और पाकिस्तान के लाखों हिंदू श्रद्धालु प्रतिवर्ष हिंगलाज माता की तीर्थयात्रा में शामिल होते हैं।
राजस्थान की वीर भूमि मेवाड़ में, भीलवाड़ा-आसींद मार्ग पर मोड़ का निम्बाहेड़ा के समीप एक अत्यंत रमणीय और पवित्र स्थान स्थित है — झरना महादेव। इसी पावन तपोभूमि पर आद्य शक्ति हिंगलाज माता का एक भव्य मंदिर स्थापित है, जो लाखों श्रद्धालुओं और विशेषकर नाथ समाज की अगाध आस्था का केंद्र है।
सावन के महीने में जब प्रकृति चारों ओर अपनी हरी चादर ओढ़ लेती है और पहाड़ियों से बहते झरने का वेग बढ़ जाता है, तब इस स्थान की छटा देखते ही बनती है। हर वर्ष हरियाली अमावस्या के पावन पर्व पर यहाँ एक विशाल मेला भरता है। इस दिन झरना महादेव का पूरा प्रांगण माता के जयकारों और महादेव के भजनों से गूंज उठता है। दूर-दूर से श्रद्धालु पदयात्रा करते हुए और अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के दरबार में शीश नवाने आते हैं। मेले में राजस्थानी संस्कृति, रंग-बिरंगे परिधान, लोकगीत और बच्चों के खिलौनों की दुकानें एक अद्भुत उत्सव का माहौल बना देती हैं।
यह धाम केवल पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना का भी एक बहुत बड़ा केंद्र है। राजगुरु नाथ समाज की परंपरानुसार, इसी हरियाली अमावस्या के दिन हिंगलाज माता मंदिर प्रांगण, झरना महादेव में समाज के पंच-पटेलों और प्रबुद्ध जनों की विशाल बैठक आयोजित होती है।
माता हिंगलाज की साक्षी में यहाँ समाज सुधार, कुप्रथाओं को मिटाने और समाज को एक नई दिशा देने के लिए महत्वपूर्ण नियम बनाए जाते हैं और उनकी समीक्षा की जाती है। लोग मानते हैं कि माता के प्रांगण में लिया गया हर निर्णय ईश्वरीय आदेश के समान होता है, जिसे पूरा समाज सहर्ष स्वीकार करता है।
आज भी भीलवाड़ा-आसींद मार्ग से गुजरने वाला हर राहगीर झरना महादेव और हिंगलाज माता के सामने अपना शीश झुकाए बिना आगे नहीं बढ़ता। यह मंदिर इस बात का प्रतीक है कि जहाँ प्रकृति (झरना) और पुरुष (महादेव) का वास होता है, वहीं आदिशक्ति (हिंगलाज माता) अपनी कृपा का अमृत बरसाती हैं।